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उत्तराखंड की जनता अब प्रतीकात्मक राजनीति नहीं, बल्कि परिणाम चाहती है
(विकास गर्ग)
देहरादून। एक तस्वीर सोशल मीडिया पर बड़ी तेजी से तैर रही है उत्तराखंड क्रांति दल के युवा प्रकोष्ठ के अध्यक्ष आशीष नेगी ने मुंबई में महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री से मुलाकात कर पहाड़ बचाने की मुहिम में सहयोग मांगा और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री ने प्रतीकात्मक रूप से ₹1 का आर्थिक सहयोग देकर पहाड़ बचाने की मुहिम में सहयोग देने का भरोसा दिलाया।
मजे की बात है उत्तराखंड की राजनीति में इन दिनों “पहाड़ बचाने” के नाम पर नए-नए राजनीतिक प्रयोग देखने को मिल रहे हैं। हाल ही में उक्रांद युवा प्रकोष्ठ के अध्यक्ष आशीष नेगी द्वारा मुंबई में महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री Uddhav Thackeray से मुलाक़ात को बड़े राजनीतिक घटनाक्रम के रूप में प्रस्तुत किया गया। इस दौरान उद्धव ठाकरे द्वारा प्रतीकात्मक रूप से 1 रुपये का सहयोग देकर “पहाड़ बचाने” की मुहिम में साथ देने की बात कही गई। लेकिन सवाल यह है कि क्या उत्तराखंड जैसे संवेदनशील राज्य की समस्याओं का समाधान अब प्रतीकात्मक राजनीति और फोटो सेशन से निकलेगा?
उत्तराखंड आज जिन समस्याओं से जूझ रहा है, वे किसी से छिपी नहीं हैं।
लगातार बढ़ता पलायन, बेरोजगारी, बदहाल स्वास्थ्य सेवाएं, बंद होते स्कूल, खाली होते गांव और पहाड़ों में घटती आर्थिक गतिविधियां राज्य के सामने सबसे बड़ी चुनौतियां हैं। हजारों गांव ऐसे हैं जहां युवा रोजगार की तलाश में मैदानों और दूसरे राज्यों की ओर पलायन कर चुके हैं। गांवों में सिर्फ बुजुर्ग और महिलाएं रह गई हैं। ऐसे में जनता यह जानना चाहती है कि वर्षों से राजनीति कर रहे लोग आखिर इन मुद्दों के समाधान के लिए जमीन पर क्या कर पाए?
राजनीतिक दल और संगठन अक्सर “पहाड़ बचाने” का नारा देते हैं, लेकिन जब सत्ता या प्रभाव में रहने का अवसर मिलता है, तब यही मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। उत्तराखंड की जनता अब भावनात्मक नारों और प्रतीकात्मक सहयोग से आगे बढ़ चुकी है।
जनता पूछ रही है कि अगर वास्तव में पहाड़ बचाने की चिंता है, तो अब तक स्थायी रोजगार नीति क्यों नहीं बनी? स्थानीय युवाओं के लिए उद्योग क्यों नहीं लगाए गए? पहाड़ी क्षेत्रों में शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं आज भी बदहाल क्यों हैं?
मुंबई में बैठकर उत्तराखंड के भविष्य पर लंबी चर्चा करना आसान है, लेकिन असली तस्वीर पहाड़ के गांवों में दिखाई देती है। वहां आज भी कई गांव सड़क, अस्पताल और इंटरनेट जैसी मूलभूत सुविधाओं से जूझ रहे हैं। कई इलाकों में युवाओं को रोजगार नहीं मिलने के कारण परिवार टूट रहे हैं।
खेती लगातार घाटे का सौदा बनती जा रही है। ऐसे में जनता यह मानने को तैयार नहीं कि केवल एक राजनीतिक मुलाकात से राज्य का भविष्य बदल जाएगा।
सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि जिन नेताओं से समर्थन लिया जा रहा है, उन्होंने अपने राज्यों में क्षेत्रीय अस्मिता और स्थानीय मुद्दों के नाम पर कितनी सफलता हासिल की? क्या उत्तराखंड को भी अब सिर्फ भावनात्मक राजनीति की दिशा में धकेला जा रहा है? क्योंकि राज्य को आज नारों से ज्यादा मजबूत आर्थिक नीति, पर्यटन का संतुलित विकास, स्थानीय उत्पादों को बाजार, और पहाड़ के युवाओं को स्थायी रोजगार की जरूरत है।
उत्तराखंड आंदोलन की मूल भावना राज्य के विकास और पहाड़ के संरक्षण से जुड़ी थी। लोगों ने इसलिए संघर्ष नहीं किया था कि भविष्य में सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी और प्रतीकात्मक समर्थन को उपलब्धि बताया जाए। राज्य बनने के दो दशक बाद भी यदि गांव खाली हो रहे हैं, तो यह केवल सरकारों की नहीं बल्कि उन तमाम संगठनों और नेताओं की भी जिम्मेदारी है, जो वर्षों से पहाड़ की राजनीति कर रहे हैं।
आज जरूरत इस बात की है कि उत्तराखंड की राजनीति भावनात्मक नारों से बाहर निकले और ठोस कार्ययोजना पर काम करे। पहाड़ बचाने की शुरुआत गांव बचाने से होगी, गांव बचेंगे तो संस्कृति बचेगी, और संस्कृति बचेगी तो उत्तराखंड की पहचान मजबूत होगी। लेकिन इसके लिए केवल राजनीतिक मुलाकातें नहीं, बल्कि जमीन पर ईमानदार प्रयास, पारदर्शी नीति और जनहित में ठोस काम करने होंगे।
